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क्या सच में सभी रोगों का एक ही कारण है ?

आपका स्वास्थ्य बहुत कुछ आपके ही हाथ में है और अपना स्वास्थ्य सुधार भी आपको ही करना होगा। इस  के लेख माध्यम से स्वास्थ्य स्तर बताने वाले उन संकेतों पर आपकी पकड़ हो जायेगी जिनका जानना अपने स्वास्थ्य के स्तर को समझने के लिये आवश्यक है। इस प्रकार अपने स्वास्थ्य की अनेक समस्याएँ सुलझाने में स्वतः समर्थ हो जाएंगे।

जब तक रोग के मूल कारण को मालूम नहीं किया जाता है, तब तक निदान कैसे विश्वसनीय और सही हो सकता है? उसका उपचार भी स्थायी एवं प्रभावशाली कैसे हो सकता है?

सभी रोगों का एक ही कारण है, वह है शरीर में विजातीय द्रव्यों (Waste products) का इक‌ट्ठा हो जाना।

वैसे तो प्रकृति शरीर से विजातीय द्रव्यों का निष्कासन करती रहती है, लेकिन जब विजातीय द्रव्यों का बढ़‌ना अधिक हो एवं निकलना कम हो तो वह संचय होना शुरू हो जाता है।

प्रकृति फिर भी उसे ज्वर, दस्त, उल्टी, जुकाम, खाँसी इत्यादि प्रक्रियाओं (तीव्र रोगों Acute Diseases) के माध्यम से बाहर निकालती है। लेकिन जब इस प्रक्रिया को दवाओं इत्यादि से दबाया जाता हे तो बाद में असाध्य रोग (Chornic Diseases) हो जाते हैं।

जैसे ही अस्वस्थता का कोई संकेत (signal) सिरदर्द, खाने की इच्छा न होना इत्यादि हो तुरन्त भोजन का त्याग करके तथा एनीमा इत्यादि द्वारा शरीर की सफाई करके विजातीय तत्वों को दूर किया जा सकता है।

ऐसा करने से तीव्र रोग कभी नहीं होगा। यदि तीव्र रोग हो जाये तो दवाओं की बजाय उपवास एवं आवश्यकतानुसार प्राकृतिक साधनों से शरीर की सफाई करने से दूर हो जाएगा। ऐसा करने से असाध्य रोग कभी नहीं आयेगा।

रोग पैदा करने वाले कीटाणु उसी स्थान पर पैदा होते हैं, जहाँ विजातीय द्रव्य (Waste Products) जमा हो जाते हैं। इसलिये वह रोग तब तक शरीर को प्रभावित नहीं कर सकता, जब तक इसके कीटाणुओं के फलने-फूलने का आधार मौजूद न हो।
 
हमारे शरीर में विजातीय द्रव्य खान-पान एवं रहन-सहन के तौर तरीकों द्वारा शरीर में जाते रहते हैं तथा शरीर में भौतिक एवं रासायनिक क्रियाओं द्वारा बनते रहते हैं। ये विजातीय द्रव्य हमारे शरीर से लगातार बाहर निकलते रहने चाहिए। इनके बाहर निकलने के चार रास्ते हैं- (1) साँस द्वारा (2) मल द्वारा (3) मूत्र द्वारा (4) पसीना द्वारा।
 
जब हमारा शरीर साँस द्वारा, मल द्वारा, मूत्र द्वारा तथा पसीने द्वारा, अन्दर जमा हुए दोष को बाहर नहीं निकाल पाता, तब शरीर दोष को बाहर निकालने के बनावटी रास्ते बना लेता है, जैसे-बवासीर, फोड़े-फुन्सी इत्यादि।
 
दोष को शरीर से बाहर निकालना चाहिए, न कि उसे दवाइयों, इन्जेक्शनों आदि द्वारा दबा देना चाहिए; क्योंकि एक जगह दबाया हुआ दोष किसी दूसरी जगह फूट पड़ता है।
 
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अलावा अन्य उपचार पद्धतियों में रोग का नामकरण उसके लक्षणों के आधार पर होता है।
 
प्राकृतिक चिकित्सा किसी भी व्याधि या विकृति के लिए रोगी के पूरे शरीर को ही इकाई मानकर चलती है। औषध विज्ञान के विचारों और उपचार पद्धति के कारण यह धारणा बंध गई है कि शरीर का एक भाग दूसरे से बिलकुल अलग है और रुग्ण होने पर उसका अलग ही उपचार करना आवश्यक है। आज शरीर के प्रत्येक अंग के रोगों के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ हैं। अंग विशेष का उपचार करने से रोग का नतीजा (परिणाम) तो ठीक हो जाता है लेकिन उसका कारण शरीर में विद्यमान रह जाता है।
 
शरीर वस्तुतः एक है और रोग का मूल कारण दूर न कर सिर्फ एक भाग में व्यक्त हुए लक्षणों को दबाने से वह अपने निकलने का कोई अन्य मार्ग ग्रहण कर लेगा।
 
इस प्रकार रोग बार-बार दबाया जाता रहता है। पर, हर बार दबाने की क्रिया से रोग कुछ गहराई में पहुँचता है और अधिक भयंकर रूप में प्रकट होता है।
 
कोई भी रोग अचानक नहीं आता, उसे प्रकट होने में महीनों-बरसों लग जाते हैं। कारण हमारे शरीर में अतिरिक्त स्थान (Spare capacity) रहता है। जब तक यह अतिरिक्त स्थान विजातीय द्रव्यों (दोषों) से भर नहीं जाएगा, अंग विशेष का रोग प्रकट नहीं होगा।
 
उदाहरण के लिये हम एक ही गुर्दे के साथ जीवन जी सकते हैं। अतः गुर्दों के 50 प्रतिशत तक काम न करने की अवस्था में भी गुर्दे की जाँच के परिणाम सामान्य (Normal) आ सकते हैं।
 
उच्चतम स्वास्थ्य को किसी मेडिकल डायग्नोस्टिक यंत्र जैसे सी.टी. स्केनिंग, अल्ट्रासाउंड, ई.सी.जी.. एक्सरे, एम.आर.आई. इत्यादि से पता नहीं लगाया जा सकता। यह सब आधुनिक यंत्र रोग की अवस्था तो बता सकते हैं, परन्तु हमारा उच्चतम स्वास्थ्य तो निरोग से कहीं ज्यादा उन्नत अवस्था है।
 
स्वास्थ्य के प्रति जागरूक आज का व्यक्ति सिर्फ इन रिर्पोटों के जरिए अपने आपको फिट समझकर यदि हाथ-पर-हाथ धरे बैठा हुआ है, तो वह अपने साथ धोखा कर रहा है। सुने या देखे अवश्य होंगे कि ऐसी सामान्य रिपोर्ट के साथ स्वस्थ दिखने वाले किसी परिचित व्यक्ति को अचानक हृदयाघात, पक्षाघात अथवा अन्य खतरनाक बीमारी लग गई और वह या तो काल का ग्रास बन गया या जीवन भर के लिए पंगु हो गया। अचानक से कभी कुछ नहीं होता, कारण भीतर विद्यमान रहता है और फिर जब यह असह्य हो जाता है, तभी किसी भयंकर रोग के रूप में विस्फोट होता है।
 
चिकित्सा जगत ने इतनी तरक्की कर ली है कि अंग-प्रत्यारोपण तो आम बात हो गई है। गंभीर-से-गंभीर बीमारियों का इलाज ढूँढने के लिए शोधशालाएँ खोल दी गई हैं। डाक्टरों व अस्पतालों की संख्या में देश-विदेश में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इतना कुछ होते हुए भी बीमारियाँ दिन-दुगुनी रात चौगुनी बढ़ रही हैं।
 
ऐसा क्या कारण है कि मोटापा, हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर, अस्थिरोग, मस्तिष्क रोग आदि दिनो-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं?
 
इसका एक ही कारण है-हम लोग बीमारी का इलाज करने के लिए नये-नये शोध करते रहते हैं परन्तु उसके रोक-थाम के उपायों पर अमल नहीं करते और न ही रोग उत्पन्न करने वाले कारणों को हटाने का प्रयत्न करते हैं। यदि हम बीमारी का इलाज ढूँढने से ज्यादा, बीमारी हो ही नहीं, इस पर ध्यान दें तो शायद पूरी मानवता स्वस्थ और दीर्घायु हो जाये।
 
रोगों के चेतावनी संकेतों को समझकर असाध्य रोगों से बचा जा सकता है। स्वयं स्वास्थ्य परीक्षण करके भारी भरकम खचों से बचा जा सकता है। हमारे शरीर में छुपी असंख्य शक्तियों को समझ कर और उनका उपयोग करके उच्च्चतम स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है। 
 
Dr. Santosh Kumaar Pandey
Naturopath, PLR Expert
SPORTS NUTRITIONIST EXPERT
MEMBER OF UPPSA
Mo- 9305078178